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संत रविदास जी का जीवन परिचय – Sant Ravidas Jayanti Biography

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जन्म जात मत पूछिए, का जातरू पॉंत । रैदास पूत सम प्रभु के कोई नहीं जात-कुजात ।।…. Sant Ravidas

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Guruji Sant Ravidas Jayanti

हमारे भारत देश को महात्माओं और संतों की भूमि कहा जाता हैं, भारत की भूमि पर अनेक बडे संतो और महात्माओं ने जन्म लिया हैं जिनसे से ही एक महान संत गुरू रविदास जी हैं। रविदास जी ने जाति पाती के भेदभाव को छोड़कर सभी को एक दूसरे साथ मिलजुल प्यार से रहना चाहिए यह सिखाया था। रविदास जी ने अपने दोहों के द्वारा समाज में फैली हुई बुराइयों और कुरीतियों के बारे में भी बताया और इन्हें दूर करने के लिए हर सम्भव प्रयास भी किया लेकिन आज हम इन्हें और इनके द्वारा बताये गये प्रवचनों को भूलते जा रहे हैं।

प्यारे दोस्ताें आज हम बात करेगें संत रविदास जी के बारे में। संत रविदास जी का जन्म माघ पूर्णिमा के दिन उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के छोटे से गॉंव गोवर्धनपुर में हुआ था। इनका जन्म 1377 ईस्वी में हुआ था। इनके पिता का नाम राहू और माता का नाम करमा था। इनकी पत्नी का नाम लोना बताया जाता हैं और इनको संत रविदास, गुरू रविदास, रैदास, रूहिदास और रोहिदास जैसे कई नामों से जाना जाता हैं। ऐसा कहा जाता हैं कि जिस दिन संत गुरू रविदास जी का जन्म हुआ था उस दिन माघ पूर्णिमा के साथ साथ रविवार का दिन भी था इसलिए इनका नाम रविदास रखा गया था। संत रविदास जी भगवान के बड़े भक्त माने जाते हैं।

इन्होंने समाज के लिए बहुत से कार्यो में समर्थन किया था। तो आज के इस आर्टिकल में हम जानेगें संत रविदास के बारे में तो आर्टिकल को लॉस्ट तक पढ़ते रहिए।

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संत रविदास जी का जीवन परिचय - Sant Ravidas Jayanti Biography

Highlights of Sant Ravidas Ji

पूरा नाम (Name)गुरू रविदास जी
अन्य दूसरे नामरैदास, रोहिदास, रूहिदास
जन्म (Date of Birth)लगभग 1377 ईस्वी
जन्म स्थान (Place of Birth)गॉंव गाेवर्धनपुर, जिला वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
पिता का नाम (Sant Ravidas Father Name)श्री संतोख दास जी
माता का नाम (Sant Ravidas Mother Name)श्रीमती कलसा देवी
दादा का नामश्री कालू राम जी
दादी का नामश्रीमती लखपति जी
पत्नी का नामश्रीमती लोना जी
बेटे का नामविजय दास जी
मृत्सु की तारीखलगभग 1540 ईस्वी (वाराणसी यूपी)

संत रविदास जी का जीवन परिचय

गुरू संत रविदास जी का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में हुआ था। गुरू रविदास (रैदास) मध्यकाल में एक भारतीय संत थे जिन्होंने जात-पात के अन्त के विरोध में कार्य किये थे। इसलिए इन्हें सतगुरू अथवा जगतगुरू की उपाधि दी जाती हैं। इन्होंने रैदासिया अथवा रविदासिया पंथ की स्थापना की और इनके रचे गये कुछ भजन सिख लोगों के पवित्र ग्रंथ गुरूग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं। गुरू रविदास जी ने साधु संतों की संगति में रहकर ज्ञान प्राप्त किया था और ये जूते बनाने का काम किया करते थे

और यही इनका व्यवसाय भी था आपको बता दे कि गुरू जी अपना काम पूरी लगन और मेहनत से करते थे और अपने काम को समय पर पूरा किया करते थे। रविदास जी ने संत रामानन्द के शिष्य बनकर उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया था। संत रविदास जी ने स्वामी रामानंद जी को कबीर साहेब जी के कहने पर गुरू बनाया था जबकि उनके वास्तविक आध्यात्मिक गुरू कबीर साहेब जी ही थे। संत जी का व्यवहार सभी लोगों के प्रति मीठा यानि मधुर था जिस कारण सभी लोग उनसे बहुत खुश रहते थे। गुरूजी बहुत ही दयालु और परोपकारी थे और सभी लोगों की सहायता करना उन्हें बहुत अच्छा लगता था।

वह लोगों को फ्री में ही जूते दे देते थे इसलिए इनके माता पिता इनके इस स्वभाव से खुश नहीं रहते थे। ऐसे ही समय निकलता रहा और कुछ समय के बाद इनके माता पिता ने रविदास जी और इनकी पत्नी को अपने घर से निकाल दिया। घर से निकलने के बाद रविदास जी पड़ोस में ही अपने एक अलग से मकान बनाकर उसमें ही अपने जूते के काम को आगे बढ़ाया और जब भी खाली समय रहता था तो वह भगवान के भजन किया करते थे और साधु संतों के सत्संग में व्यस्त रहते थे।

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संत रविदास जी का स्वभाव

गुरूजी के जीवन की बहुत सी छोटी और मोटी घटनाओं से इनके गुणों के बारे में पता चलता हैं। तो चलिए आपको संत रैदास जी के बारे में एक छोटी सी कथा सुनाते हैं। एक बार की बात हैं उनके मौहल्ले में एक छोटा सा त्यौहार या पर्व चल रहा था इस पर्व के अवसर पर आस पडोस के लोग गंगा स्नान ने के लिए जा रहे थे। रैदास जी के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने के लिए विनती की तो वे बोले गंगा स्नान के लिए मैं जरूर चलूंगा लेकिन अगर मैं गंगा स्नान के लिए चलूंगा तो मेरा काम का क्या होगा जिससे मेरा गुजारा चलता हैं और मेरा मन तो यही काम में ही लगा रहेगा तो गंगा स्नान का पुण्य कैसे मिलेगा।

फिर गुरूजी ने कहा कि मन जो काम करने के लिए दिन से कहता हैं हमें वो ही काम करना चाहिए, मन सही है तो सब कुछ सही हैं और इसे कठोते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य मिल सकता हैं। कहा जाता हैं कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही आजतक एक कहावत प्रचलित हो गई हैं ”मन चंगा तो कठौती में गंगा

रैदास जी का स्वभाव

रैदास जी ने उंच नीच की भावना और भगवान की भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवादों को सारहीन तथा बेकार बताया और सबको आपस में मिलजुल कर प्यार से रहने का उपदेश दिया। गुरूजी स्वयं ही मीठे और भक्ति भरे भजनों को लिखा करते थे और फिर उन भजनों को भाव-विभोर होकर सभी को सुनाते थे। रैदास जी का विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के नाम हैं। वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमात्मा का गुणगान किया गया हैं।

कृस्त्र, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा ।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा ।।
चारो बेद के करे खंडौती । जन रैदास करें दंडौती ।।

रैदास जी का स्वाभाव

उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित भावना तथा अच्छे व्यवहार का पालन करना जरूरी हैं अपने अभिमान को त्याग कर दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया। इतना ही नहीं रवि जी ने अपने एक भजन में भी कहा था-

कह रैदास तेरी भगति दूरि हैं, भाग बड़े सो पावै ।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै ।।

गुरूजी के विचारों का एक अर्थ हैं कि भगवान की भक्ति बड़े ही भाग्य से मिलती हैं, अपने घमझड को खत्म करके काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल होता हैं, जैसे कि विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता हैं जबकि छोटे से शरीर वाली चींटी इन कणों को आसानी से चुन लेती हैं। इसी प्रकार अपने अभिमान और बडेपन के भाव को त्याग कर दयापूर्वक व्यवहार करने वाला मनुष्य ही भगवान/ईश्वर का भक्त हो सकता हैं।

गुरू जी की वाणी का आस पास के लोगों पर बहुत ही असर पड़ा और फिर गुरूजी समाज के सभी वर्गों के लोगों के प्रति श्रद्धालु बन गये। कहा जाता हैं कि मीराबाई उनकी भक्ति भावना से बहुत प्रभावित हुई और फिर उनकी शिष्या बन गयी थी।

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वर्णाश्रम अभमान तजि, पद रज बंदहिजासु की ।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की ।।

संत रविदास जी के दोहे

संत रविदास जी ने समाज के सभी वर्गो को हमेशा जातिवाद को त्यागकर प्रेम से रहने के लिए शिक्ष दी थी, संत जी को कभी भी धन और माया का मोह नहीं था। तो चलिये अब इनके द्वारा कहे गये कुछ दोहों के बारे में जान लेते हैं ताकि इनके दोहों से हम हमारे जीवन को सफल बना सके और हम भी जीवन में कुछ बेहतर करने का प्रयास करें।

ब्राहाण मत पूजिए जो होवे गुणहीन ।
पूजिए चरण चंडाल के जो होने गुण प्रवीन ।।

मन ही पूजा मन ही धूप ।
मन ही सेऊं सहज स्वरूप ।।

रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच ।
नकर कूं नीच करि डारी हैं, ओछे करम की कीच ।।

मन चंगा तो कठौती में गंगा ।।

करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस ।
कर्म मानुष का धर्म हैं, सत भाखै रविदास ।।

कह रैदास तेरी भगति दूरि हैं, भाग बड़े सो पावै ।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै ।।

कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा ।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा ।।

जन्म जात मत पूछिए, का जातरू पॉंत ।
रैदास पूत सम प्रभु के कोई नहीं जात-कुजात ।।

का मथुरा का द्वारका, का काशी हरिद्वार ।
रैदास खोजा दिल आपना, तउ मिलिया दिलदार ।।

संत रविदास जी के अनमोल वचन

रैदास जी की जयंती हर साल बड़े ही जोर शोर मनाई जाती हैं। संत जी ने जिस समाज की नींच रखी, वह हमेशा से ही अदभुत हैं तो अब इनके कुछ अनमोल वचन को हिन्दी में जानने की कोशिश करते हैं।

  • किसी के लिए भी पूजा इसलिए नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह व्यक्ति पूजनीय पद पर बैठा हैं, अगर व्यक्ति में योग्य गुण नहीं हैं तो उसकी पूजा नहीं करनी चाहिए, लेकिन अगर कोई व्यक्ति उंचे पद पर नहीं भी बैठा लेकिन उसमें योग्य गुण हैं तो ऐसे व्यक्ति की ही पूजा करनी चाहिए।
  • कोई भी व्यक्ति छोटास या बड़ा अपने जन्म के कारण नहीं बनता बल्कि अपने कर्मों के कारण होता हैं, व्यक्ति के कर्म ही उसे ऊंचा या नीचा बनाते हैं।
  • भगवान उस ह्रदय में निवास करते हैं जहां किसी भी तरह का बैर भाव नहीं होता हैं, न ही कोई लालच या द्वेष होता हैं।
  • हमें हमेशा कर्म करते रहना चाहिए और साथ-साथ मिलने वाले फल की भी आशा नहीं छोड़नी चाहिए, क्योंकि कर्म हमारा धर्म हैं और फल हमारा सौभाग्य हैं।
  • कभी भी अपने अंदर अभिमान को जन्म नही देना चाहिए, क्योंकि एक छोटी सी चींटी शक्कर के दानों को बीन सकती हैं लेकिन एक विशालकाय हाथी शक्कर के दानों को नहीं बीन सकता।

Sant Ravidas Anmol Vachan

  • मोह माया में फंसा जीव भटकता रहता हैं, इस माया को बनाने वाला ही मुक्ति दाता हैं।
  • जिस तरह से तेज हवा के चलते सागर में बड़ी लहरें उठती हैं और फिर से सागर में ही समा जाती हैं, सागर से अलग उनका कोई अस्तित्व नहीं होता हैं, इसी तरह से परमात्मा के बिना मानव का भी कोई अस्तित्व नहीं हैं।
  • भ्रम के कारण सांप और रस्सी तथा सोन के गहने और सोने में अन्तर नहीं जाना जाता हैं, लेकिन जैसे ही भ्रम दूर हो जाता हैं वैसे ही अंतर ज्ञात होने लगता हैं, इसी तरह अज्ञानता के हटते ही मानव आत्मा, परमात्मा का मार्ग जान जाती हैं, तब परमात्मा और मनुष्य में कोई भेदभाव वाली बात नहीं रहती
  • अज्ञानी सभी लोग जाति-पाती के चक्कर में उलझ कर रह गये हैं, रैदास जी कहते हैं यदि वे इस जातिवाद के चक्कर से नहीं निकलते हैं तो एक दिन जाति का यह भंयकर रोग संपूर्ण मानवता और मानव जाति को नीचा दिखाएगा।

अलग-अलग नामों से जाना जाता हैं

संत रविदास जी को बहुत से नामों से जाना जाता हैं पंजाब में संत रविदास जी को संत रविदास कहा जाता हैं तो वहीं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में इन्हें रैदास के नाम से जाना जाता हैं। गुजरात और महाराष्ट्र के लोग इन्हें रोहिदास के नाम से पुकारते हैं। बंगाल के लोग उन्हें रूइदास कहते हैं लेकिन ज्यादातर लोग इन्हें रविदास के नाम से ही जानते हैं।

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